“पधारो म्हारे देस”! लेकिन ज़रा सम्हल के। यह मैं नहीं कह रहा हूँ, यह कहना है राजस्थान के सड़क दुर्घटनाओं के आंकड़ों का। जी हाँ, वर्ष 2021 से 2023 की अवधि में राजस्थान में सड़क दुर्घटनाओं में 15% की वृद्धि हुई है। भारत सरकार के सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा दि० 10/12/2025 को संसद में प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2023 राजस्थान में 24705 सड़क दुर्घटनाओं में 11762 लोगों की मृत्यु हुई और 24800 लोग घायल हुए। इन में से ¼ दुर्घटनाएं जयपुर, जोधपुर और उदयपुर जिलों में घटीं। इसी वर्ष अकेले राजधानी जयपुर में 849 लोग मारे गए, जो कि नई दिल्ली और बेंगलुरु के बाद तीसरी सबसे बड़ी संख्या है।(https://english.bhaskar.com/etpanBjaOZb) प्रदेश में प्रति 100 दुर्घटनाओं में मृतकों की संख्या का औसत 47 से 48 है जो कि राष्ट्रीय औसत से 33% अधिक है। मृतकों की संख्या के लिहाज़ से राजस्थान का देश में छठा स्थान है। नवम्बर 2025 में India Today की एक रिपोर्ट के अनुसार राज्य में सड़कों की कुल लम्बाई का 8% ही प्रादेशिक और राष्ट्रीय राजमार्ग हैं, जिन में राज्य की 60% मौतें हुई हैं।
अब प्रश्न यह उठता है कि ऐसे हालत बने कैसे। ‘PRS Legislative Research’ (एक स्वतंत्र गैर-लाभकारी शोध संस्थान) के अनुसार राजस्थान में 73% दुर्घटनाएं तेज़ गति से वाहन चलाने के कारण हुई हैं। मृतकों में लगभग आधी संख्या पैदल और दोपहिया वाहनों पर चलने वालों की है। इसके अलावा गलत दिशा में वाहन चलाना, सीट बेल्ट का प्रयोग न करना, दोपहिया वाहनों पर हेलमेट न पहनना, नशे में वाहन चलाना, वाहन चलाते समय मोबाइल का प्रयोग करना दुर्घटनाओं के मुख्य कारण हैं। साथ ही सड़क किनारे गलत तरह से वाहन पार्क करना, राजमार्गों के आस पास अवैध अतिक्रमण, राजमार्गों के मीडियन में निकाले गए अवैध कट तथा आमतौर पर सुरक्षा व नियमों के प्रति उदासीनता की प्रवृत्ति इस स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं।
पिछले दशकों में राज्य में परिवहन के मूलभूत ढांचे में अभूतपूर्व सुधार आया है। परन्तु जनसँख्या के बढ़ते दबाव, दोपहिया-चौपहिया वाहनों की बढ़ती संख्या और आम जन की उदासीनता के चलते ये सभी प्रयास विफल हो जाते हैं। भारत सरकार और राजस्थान सरकार ने आधुनिक तकनीक का प्रयोग कर सड़क दुर्घटनाओं की रोकथाम के प्रयास किये हैं। इनमें ‘black spots’ की पहचान तथा उनके आसपास सुरक्षा का संवर्धन, ATMS, ANPR, e-challan, E-DAR और ईलेक्ट्रोनिक मॉनिटरिंग आदि शामिल हैं। राजस्थान में तो सड़क सुरक्षा सम्बन्धी सुधारों के लिए रूप. 2350 करोड़ का प्रावधान किया गया है। इन सुधारों का प्रभाव दिखने में समय लगेगा।
तो क्या हमें अपना दायित्त्व भूल कर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना चाहिए? क्या सड़क दुर्घटनाओं को रोकने की सारी ज़िम्मेदारी सरकारों की है? नहीं? तो हम क्या कर सकते हैं? मेरा विश्वास है कि सरकार और उसकी एजेंसीज कुछ भी कर लें जब तक हम भारतीय सड़कों पर अपना व्यवहार नहीं सुधारेंगे, तब तक सड़कों को और अधिक सुरक्षित नहीं बनाया जा सकता। इसके लिए आवश्यक है कि हमें यातायात के नियमों का पालन करने साथ साथ अपना रवैया भी बदलना होगा; बेहतर सिविक सेंस, धैर्य और विनम्रता का विकास करना होगा। वैसे तो सभी को पता है कि क्या करना चाहिए लेकिन लापरवाही, सुस्ती और झूठे घमंड के कारण हम इन बातों पर ध्यान नहीं देते:
सबसे पहले तो गति सीमा व लेन अनुशासन का ध्यान रखा जाना चाहिए,
यानि वाहन को उसकी निर्धारित लेन में निर्धारित गति सीमा में ही चलाएं,
दूसरे वाहनों से उचित दूरी (तीन सेकंड नियम) बनाये रखें,
अचानक लेन न बदलें,
न ही गति में परिवर्तन करें,
रॉंग साइड में किसी भी स्थिति में न चलें,
बाईं ओर से ओवरटेक न करें और
हाइवे पर चढ़ते समय हाइवे पर चल रहे वाहनों को रास्ता दें.
स्वयं और वाहन की सुरक्षा
किसी भी यात्रा पर से निकलने से पहले वाहन को सावधानी से जाँच लें,
दोपहिया चालक व सहयात्री आवश्यक रूप से सर्टिफाइड क्वालिटी के हेलमेट पहनें व हो सके तो प्रोटेक्टिव गियर भी पहन कर ही चलें,
सावधानी
वाहन चलाते समय मोबाईल का प्रयोग न करें,
नशे में वाहन न चलाएं,
थकान में वाहन चलाने से बचें और
मौसम, दृश्यता व सड़क की स्थिति का ध्यान रखते हुए चलें.
यदि आप या आपके सामने कोई अन्य व्यक्ति दुर्घटनाग्रस्त हो जाये तो?
हैजर्ड लाइट्स व रेफ्लेक्टर्स की मदद से घटना स्थल को सुरक्षित करें,
NHAI की हेल्पलाइन 1033 तथा एम्बुलेंस सेवा के लिए 108 पर सूचना दें,
यदि घायल व्यक्ति के खून बह रहा हो तो साफ कपडे की सहायता से दबाव या बांध कर खून बहना रोका जा सकता है,
घायल को हिलाएं डुलाएं नहीं, रीढ़ की चोट में यह घातक हो सकता है.
दुर्घटना ग्रस्त लोगों की मदद करने वालों को भारत में कानूनी संरक्षण प्राप्त है.
आपात स्तिथि में प्राण रक्षा सर्वोपरि लक्ष्य है.
धन्यवाद, जय हिन्द